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क्या नेहरू ने खुद को ही भारत रत्न दे दिया था? जानें किस्सा नेहरू को देश का सर्वोच्च सम्मान मिलने का

15 जुलाई के दिन ही देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भारत रत्न से सम्मानित किया है। वह देश के पहले ऐसे शख्स से जिन्हें प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए ही देश के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया था। उनके बाद सिर्फ इंदिरा गांधी ही थी जिन्हें प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए भारत रत्न मिला था। भारत रत्न पुरस्कार की शुरुआत साल 1954 में की गई थी।

नई दिल्ली : द्वितीय विश्वयुद्ध को खत्म हुए अभी महज एक दशक ही बीता था। दुनिया पूरी तरह से दो खेमों में बंटी हुई थी। यह शीत युद्ध का दौर था। एक खेमे में सोवियत संघ और चीन जैसे कम्युनिस्ट देश थे तो दूसरी तरफ अमेरिका के साथ यूरोपीय देश थे। भारत अभी नया-नया ही आजाद हुआ था। दुनिया के बदले समीकरणों के बीच भारत अपनी जरूरतों के लिए अमेरिका और रूस जैसे बड़े देशों पर निर्भर था। अमेरिका की तरफ से भारत को खाद्य सहायता और कृषि क्षेत्र में मदद मिल रही थी। इस समय भारत अपने यहां औद्योगिकरण की नींव रख देश को आर्थिक रूप से मजबूत करना चाहता था। जवाहर लाल नेहरू उस समय देश के प्रधानमंत्री थे। उस समय भारत ने गुटपेक्ष नीति को अपनाते हुए किसी भी खेमे में शामिल नहीं होने का निर्णय लिया।

जब सोवियत संघ दौरे पर नेहरू पर बरसे थे गुलाब


1954 में चीन के साथ तिब्बत को लेकर समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद जवाहर लाल नेहरू ने यूएसएसआर के साथ ही यूरोपीय देशों का भी दौरा किया। नेहरू ने दोनों खेमों के देशों के साथ संबंधों पर जोर दिया। हालांकि, उस दौरान सोवियत संघ की तरफ अधिक झुकाव को लेकर नेहरू की आलोचना भी हुई। जवाहर लाल नेहरू 7 जून 1955 को सोवियत संघ पहुंचे। नेहरू के यह दौरा भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ। इस दौरे पर रूस भारत में भारी उद्योग लगाने में मदद करने को लेकर सहमति जताई। इस दौरे के बाद दुनिया में भारत की एक अलग छवि बनी। इस दौरे पर एक खास बात यह थी कि जब नेहरू जिस रास्ते से गुजर रहे थे, उस दौरान उन पर कुछ लोगों ने गुलाब भी बरसाए थे। सोवियत संघ और यूरोप के इस दौरे का लक्ष्य तेजी से बढ़ते कोल्ड वॉर के दौर में शांति को बढ़ावा देना था। नेहरू ने दुनिया के मुद्दे पर भारत को ना सिर्फ एक महत्वपूर्ण देश बल्कि उसको दुनिया में अभूतपूर्व समर्थन भी दिलवाया।

राष्ट्रपति ने भोज पर दी भारत रत्न देने की जानकारी


13 जुलाई 1955 को जवाहर लाल नेहरू यूरोप और सोवियत के दौरे से दिल्ली वापस आए। उस समय नेहरू जब दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरे तब प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए राजेंद्र प्रसाद खुद उनका स्वागत करने पहुंचे थे। राजेंद्र प्रसाद के अलावा काफी लोग नेहरू के स्वागत के लिए मौजूद थे। एयरपोर्ट पर उस समय नेहरू को एक छोटा सा भाषण देने के लिए भी जोर दिया गया। नेहरू के लौटने के बाद राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति भवन में एक भोज का आयोजन किया। सभी आमंत्रित लोगों की मौजूदगी में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू को लेकर कहा, ‘यह हमारे समय के शांति के सबसे बड़े वास्तुकार हैं।’ इसके साथ ही उन्होंने जवाहर लाल नेहरू को भारत रत्न पुरस्कार के लिए चुने जाने की जानकारी साझा की। डॉ. प्रसाद ने कहा कि जवाहर सचमुच एक भारत रत्न है। ऐसे में औपचारिक रूप से उन्हें भारत रत्न क्यों नहीं दिया जाए? डॉ. प्रसाद ने कहा कि उन्होंने (नेहरू) शांति की नींव रखी और आप देखेंगे कि यह यात्रा ऐतिहासिक महत्व की साबित होगी। डॉ. प्रसाद के नेहरू पर इस बात का गर्व था कि उनके प्रयासों से भारत अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत रूप से खड़ा दिखाई दे रहा था।

नेहरू का प्रशस्ति पत्र नहीं पढ़ा गया


भारत रत्न पुरस्कार की शुरुआत साल 1954 में की गई थी। पुरस्कार शुरू होने के दूसरे साल ही नेहरू को यह पुरस्कार देने की घोषणा की गई। जुलाई 1955 को जवाहर लाल नेहरू को विशेष रूप से आमंत्रित गणमान्य लोगों की मौजूदगी में भारत रत्न से विभूषित किया गया। कुछ समय पहले आई पत्रकार राशिद किदवई ने अपनी किताब में लिखा है कि राष्ट्रपति भवन में आयोजित नेहरू के भारत रत्न सम्मान समारोह में तत्कालीन केंद्रीय गृह सचिव एवी पाई ने सम्मान पाने वाली विभूतियों के नाम पुकारे, लेकिन नेहरू का प्रशस्ति-पत्र नहीं पढ़ा गया था। किदवई के अनुसार प्रशस्तियों की आधिकारिक पुस्तिका में प्रधानमंत्री का महज नाम दर्ज है। इसमें उनके द्वारा की गई सेवाओं का वहां कोई जिक्र नहीं है। सामान्य रूप से यह उल्लेख परम्परागत रूप से उस पुस्तिका में किया जाता है। उस समय के लोगों का कहना था कि देश और समाज के लिए नेहरू के अप्रतिम योगदान का चंद पैराग्राफ में जिक्र करना कठिन होगा, इसलिए उसे छोड़ दिया गया।

क्या नेहरू ने खुद को दे दिया था भारत रत्न


नेहरू को भारत रत्न से सम्मानित किए जाने को लेकर एक विवाद भी है कि उन्होंने खुद को ही भारत रत्न दिए जाने की सिफारिश कर दी। सोशल मीडिया पर भी इस तरह का बातें खूब चली। आमतौर पर भारत रत्न सम्मान दिए जाने को लेकर प्रधानमंत्री की तरफ से राष्ट्रपति को सिफारिश भेजी जाती है। इसके बाद राष्ट्रपति इस पर फैसला करता है। चूंकि, जवाहर लाल नेहरू को जिस समय भारत रत्न देने का फैसला किया गया, उस समय वह विदेश दौरे पर थे। बताया जाता है कि भारत रत्न दिए जाने को लेकर जानकारी तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू के लौटने तक किसी से साझा नहीं की थी। ऐसे में प्रथम दृष्टया यह नहीं लगता कि नेहरू ने खुद को भारत रत्न दे दिया हो।

धर्म से लेकर हिंदू कोड बिल पर नेहरू की असहमति


एक ही पार्टी में रहने के बावजूद पंडित जवाहर लाल नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बीच राजनीतिक मुद्दों को लेकर आपस में असहमतियां थी। समाज में धर्म को लेकर दोनों के विचारों में भिन्नता थीं। नेहरू जहां आधुनिक समाजवाद के पैरोकार थे। उनका मानना था कि भारत की जो उस समय की स्थितियां थीं वह धर्म की वजह से थीं। उनका मानना था कि भारत को भगवान की मूर्ति और पूजारियों से अधिक तरजीह वैज्ञानिक चेतना के आधार पर विकास को देना चाहिए चाहिए। इसके अंतर्गत बड़े उद्योग, नियोजित शहर, अस्पताल, स्कूल और लैब्स बनाई जानी चाहिए। राजेंद्र प्रसाद भी प्रगति के पक्षधर थे लेकिन उनका मानना था कि यह सब भारतीय संस्कृति और लोगों के भावनाओं की कीमत पर नहीं होना चाहिए। वह बहुत धार्मिक व्यक्ति थे। राजेंद्र प्रसाद और जवाहर लाल नेहरू के बीच हिंदू कोड बिल को लेकर था। डॉ भीमराव अंबेडकर ने अक्टूबर 1947 में संविधान सभा में मसौदा पेश किया और नेहरू ने उनका समर्थन किया। इसके तहत सभी हिंदुओं के लिए एक नियम संहिता बनाई जानी थी। संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में डॉ राजेंद्र प्रसाद ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसे नियम जनता की राय को ध्यान में रखकर ही बनाए जाने चाहिए। इसको लेकर खूब विवाद भी हुआ। उस समय नेहरू ने इस पर कड़ा रुख अपनाया। वह बिल को पारित कराने के लिए दृढ़ थे, भले ही उन्हें सारा दोष अपने ऊपर लेना पड़े।

राजेंद्र प्रसाद ने नाराज होकर नेहरू को लिखा था पत्र

नेहरू के रवैये से नाराज राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें एक पत्र भी लिखा था। आजादी के बाद जब राष्ट्रपति चुनने का सवाल आया तो नेहरू डॉ. राजेंद्र प्रसाद के पक्ष में नहीं थे। वह चाहते थे कि तत्कालीन गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी ही राष्ट्रपति बने। हालांकि, सरदार वल्लभ भाई पटेल इसके समर्थन में नहीं थे। वह, ताकत का संतुलन चाहते थे। पटेल और राजेंद्र प्रसाद की पार्टी संगठन में अच्छी पकड़ थी। पटेल की रणनीति का नतीजा ही था कि बाद में राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने। गुजरात में सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार के बाद उसके उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर भी दोनों के मतों में भिन्नता थी। नेहरू नहीं चाहते थे राष्ट्रपति के पद पर बैठा व्यक्ति इस तरह के किसी भी धार्मिक आयोजन का हिस्सा बने। नेहरू के विरोध के बावजूद राजेंद्र प्रसाद इस कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इस विचारधारा में भिन्नता का मतलब राजनीतिक दुश्मनी तो कतई नहीं था। दोनों नेता एक दूसरे का पूरा सम्मान करते थे।

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